ब्लॉग पर वैचारिक वमन होता है। टीपों के जरिए खुजलाने का खेल होता है। कुछ कविता कर स्खलित हो जाते हैं। कुछ गद्य लिखकर तो कुछ इन को पढ़कर ही स्खलित हो जाते हैं क्योंकि स्खलन-सुख लेना मानव का प्रिय स्वभाव है। वैचारिक स्खलन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का परमसुख है। यह हाथ आने वाली वो अनुभूति है जिसका स्वाद लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखने वाला नागरिक लेता है। इससे लोकतंत्र का खेल रोमांचक होता जाता है। हिन्दी की सेवा, सामाजिक मसलों पर अपनी जागरुकता दिखाना, वैचारिक संघर्ष का आमंत्रण, दलित-नारी और मीडिया विमर्श- ऐसे भारी-भरकम शब्द हैं जिनका महज़ ज़िक्र करते हुए आप अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता सिद्ध कर सकते हैं। दरअसल, यह खुजाल से ज़्यादा कुछ नहीं है। आपके आस-पास ऐसा बहुत कुछ है जिसे करने के लिए आपको किसी का लिखा पढ़ने की ज़रूरत नहीं और ना ही लिखने की ज़रूरत होती है। क्योंकि जिनसे आप चर्चा करना चाहते हैं अव्वल तो वो आपसे चर्चा करने का इच्छुक नहीं है। वो तो आपके स्खलन लेखन पर टीप देते ही खुद स्खलित हो जाता है। यदि वो चर्चा को इच्छुक हो भी गया तो करने को इच्छुक क़तई नहीं होते है। हर कोई बोलना-लिखना चाहता है। स्खलन का सुख लेना चाहता है। करना होई नहीं चाहता। क्रांति की बात सुख देती है, करना दुखदायी है

जहां तीन-चार इकट्ठा हुए उसे ब्लॉगरमीट का नाम दिया जाता है। कभी कभी दो या तीन ब्लॉगर ऐसे मिलते हैं मानों शिखर बैठक हो रही हो। कभी कभी दर्ज़नभर मिल जाते हैं। ऐसी ही बैठक दिल्ली मे हुई जब कुछ लोग इकट्ठा हुए थे। कुछ हाई-टैक लोग भी इकट्ठा हुए थे। कुछ लोग लो-टेक थे। जो हाई होता है वो लो भी होता है। चूंकि लो दिखना लोचे में फंसा देता है इसलिए व्यक्तियों की तरह ब्लॉगर भी कभी कभी लो से हाई हो जाता है। यह सुविधाजनक होता है कि आप व्यस्त दिखते हुए कुछ लोगों को फालतू साबित कर देते हैं। पुराणिक और पंगेबाज़ लेपटॉप में उलझे दिखाई दिए, नीरज अपने दो-तीन फोन पर बतियाते हुए बैठक में भी बिज़ी दिखाई देने लगे। काकेश लिखते धांसू है पर यहां नहीं बोले क्योंकि कुछ लोग उनसे ज़्यादा सुरीला गा रहे थे। कुछ रईस तो कुछ मिडिल क्लास। ये सभी एक साथ दिख रहे थे, जिससे समाजवादी मीटिंग होने का भ्रम बनता है। एक नारी भी थी। नारी थी, ठीक से समझो कि वो कवियत्री भी थी। एक नर आया था जो ब्लॉगर नहीं था। बाकी ब्लॉगर थे। जो ब्लॉगर थे वो आतुर थे अपनी बुद्धि का लोहा मनवाने। कुछ ब्लॉग पर लोहा-लंगड़ छाप लिखते हैं। ब्लॉगर मीट में क्या होता है? पहाड़ खोदने का काम नहीं होता। ना ही कोई ठोस करना चाहता है क्योंकि कोई भी ठुकवाने का इच्छुक नहीं होता। खाली-पीली आकर चेहरा दिखाना है ताकी ब्लॉग पर टीपों का खेल चलता रहे।

दिल्ली की ब्लॉगर बैठक के केंद्र में फुरसतिया थे क्योंकि वो कानपुर के रहने वाले हैं और संयोग से दिल्ली आना हो गया तो हमेशा की तरह ब्लॉगवाणी ने बैठक रख दी। ब्लॉगवाणी मेजबानी करता है क्योंकि वो मेहमान नहीं बनना चाहता। पिछले दिनों जितनी बैठकें संतनगर के बाहर रखी गईं ब्लॉगवाणी उन बैठकों में नहीं जाते। मेजबानी का सबसे बड़ा सुख मेजबान होना है। स्वत्व का विषय है। स्वामित्व का बोध तीव्र है। मेरी सत्ता का सुख परमसुख है। फोकटिया लोग इसमें भी सुविधा ढूंढ लेते हैं इसलिए सौहार्द्रता के नाम पर मुंह उठाए चले आते हैं। बाज़ारवादी संस्कृति में बना-बनाया रेडीमेड मिल जाए तो सुख ही सुख है। प्रायोजक मिल जाए तो परमसुख। साझेदारी से आयोजन करना समाजवादी तरीक़ा है। ओल्ड फ़ैशन है। सहकारिता का बोध ख़त्म हो चुका है। हर कोई प्रायोजक की तलाश में घूम रहा है। बैठकें, सेमीनार, सम्मेलन, गणेश-पूजा, दुर्गा नवमी, दशहरा सब कुछ प्रायोजित किए जाने लगे हैं। चंदे की रसीद छपवाने से लेकर विसर्जन झांकी तक प्रायोजक के भरोसे निपटाई जाती है। रेडियो-टीवी के प्रोग्राम बिना प्रायोजक के दम तोड़ देते हैं। प्रायोजक मुख्य है, प्रयोजन नहीं। सनडे की सुविधा का लाभ उठाते हुए आए लोगों को एक साथ कई सुविधाएं फोकट में संतनगर में मिल जाती हैं।

बैठक फुरसतिया के लिए रखी गई थी। जो लिक्खाड़ होता है वो बोलता कम है। लिखने में पारंगत होने का अर्थ यह नहीं कि बोलने में चतुर होगा। या ये हो सकता है कि फुरसतिया चतुराई दिखाने में रिस्क देखते हों। लिहाज़ा वो अपने साथ अपने मामा कन्हैया लाल नंदन को लेते आए और नंदन मामा बोले, भांजे फुरसतिया क्षेपक का रोल निभाते रहे। पुरानी सरकारों के साथ अपनी नज़दीकियों का असर मामा जी के चिंतन में नज़र आ रहा था। वे ज्ञानी जैल सिंह से लेकर अभी के मनमोहन सिंह तक विचार ठेल रहे थे। भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते पर बोलते बोलते नंदन मामा ने लगे हाथ वामपंथियों को कोस लिया। यह भी कह गए कि भारतीय जनमानस अमेरिका के साथ है। भड़ास ने नंदन मामा के शब्दों के बीच में अपना विरोध नम्रता के साथ खींचा। लाइन किसी ने नहीं खींची क्योंकि अल्पज्ञता का बोध कोई नहीं होने देना चाहता था। छह अगस्त को भारत सरकार ने विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर समझौते के जो मुख्य बिंदु प्रकाशित किए हैं वो किसी को भी समझौते की पूरी डिटेल नहीं देते। जिसने जहां से सुना-पढ़ा उसके आधार पर विचार बना लिए। फिर भी नंदन मामा के अलावा भड़ासियों ने इस समझौते पर अपने विचार बना लिए हैं और समझौते के बारे में विशेष जानकारी दे रहे थे। कुछ ने तो बाक़ायदा पोस्टें लिख डाली हैं।

भड़ास के पत्रकार भी आए थे। राजेश ने लिखा है कि भड़ासिए हैं बड़े प्यारे। हां भई, किसी के पिछवाड़े में इतनी ताक़त थोड़ी है जो सामने आकर मां-बहन की गालियां दे। राजेश को गाली पड़ी होतो तो उसे प्यारा कौन लगता? असफेरे में गालियां पड़ती है तो पड़ने दो अपने मुंह पर कौन थूकता है। पत्रकारों से बड़ा कौन होगा जो प्रेस छापकर बिना लाइसेंस की गाड़ी चलाए और जनता को भ्रष्टाचारमुक्त समाज का आह्वान करता हो। यों भी मां-बहन की गालियां तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। ये आज़ादी का प्रतीक है, मुंह खोलकर गालियां लिख मारो। पंगेबाज़ और भड़ासियों के रिश्ते पुराने हैं। पंगबाज़ उद्यमी है और उधमी भी। मसिजीवी आए लेकिन गृहस्थी लेकर नहीं आए। अमूमन उनके साथ घरवाली और साली भी आती हैं। बैठक में वे अकेले आए इसलिए मोहल्ले के साथ ही चिपके रहे। कीबोर्ड के सिपाही भी आए और सबसे ज़्यादा खुसर-पुसुर करते रहे। कभी मोहल्ले में तो कभी भड़ासियों के साथ तो आखिर में देर तक एकमात्र मौजूद ब्लॉगरिन के साथ। ये भरोसे के क़ाबिल इंसान नहीं हैं। नारद हो या ब्ल़ॉगवाणी दोनों तरफ़ इन्हें शक की नज़र से देखा जाता है।

परिचर्चा के लट्ठबाज़ अमित की कमी देखी गई क्योंकि पिछली बैठक में वे स्खलन के विरोधी माने गए थे और लोगों के ग़ुस्से का निशाना बने थे। पिछली बार से सबक लेकर वो अपने मानसपिता की आज्ञा निभाते हुए नहीं आए। हिन्दुस्तान में काम करने वाले मैत्री अतुल कुमार और विस्फोट के संजय तिवारी भी बैठक में आए। संजय तिवारी को विदेश मामलों की अच्छी समझ है उन्होंने तुर्की की राजधानी इस्ताम्बुल की अंकारा यूनीवर्सिटी से ”अमेरिकी सभ्यता और इरानी मुग़ालते” विषय में पीएचडी कर रखा है। लिहाज़ा हर बार वे बात खत्म होने से पहले नया विषय लेकर चर्चा का रुख मोड़ देते थे। जगदीश भाटिया आखरी तक ये सोच रहे थे कि वे यहां क्या करने आए हैं। सृजनशिल्पी के पास बहुत से राज़ है चिट्ठाजगत के… लेकिन उनका हाज़मा नहीं बिगड़ता- ये हैरानी की बात है। दोनों साथ आए थे। देर से आने का लाभ आपकी आमद पर देखने मिलता है। देर से महफ़िल में बैठे लोगों को देर से आने वाले लोगों की शख्सियत में बडप्पन दिखायी देता है। नंदन मामा से सृजन खुसुर पुसुर करते देखे गए।

बाकी छोटे ब्लॉगर थे जो नए नए हैं। नए लोगों को अभी अपने को साबित करना है। साबित करने के दो तरीक़े हैं। या तो वे भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का लाभ उठाकर स्खलन और खुजलन के इस कार्यक्रम में शामिल हो जाएं या फिर दूर से सलाम करें। धन्य है छोटे शहरों के चिट्ठाकार जो इस पचड़े में अब तक नहीं पड़े हैं इसलिए चिट्ठाजगत चमकीला दिख रहा है। दिल्ली के बाशिंदों का ध्येय वाक्य उनकी ताक़त है.. वे कह रहे हैं, “हमसे लड़ने की हिम्मत तो जुटा लोगे लेकिन कमीनापन कहां से लाओगे”